प्राणायाम के बारे मे विस्तरित जानकारी और उनसे होने वाले सभी लाभों के बारे जाने....मे

प्राणायाम के बारे मे विस्तरित जानकारी और उनसे होने वाले सभी लाभों के बारे जाने....मे
प्राणायाम विधि

जानिए प्राणायाम क्या है

दोस्तो में हु बजरंग आपका दोस्त जो आज आपको प्रणायाम क्या ह ,इसका उद्देश्य क्या ह ,इसके कितने प्रकार ह,ओर उनसे होने वाले लाभों के बारे मे विस्तार से सही और सम्पूर्ण जानकारी बताऊंगा जिससे हम अपने जीवन म इनको अपनाकर एक स्वस्थ जीवन यापन कर सकते ह ओर साथ ही अनेक रोगों से हमारे शरीर को मुक्ति दिला सकते हैं।तो आइए दोस्तो प्रमुख प्रणायाम के बारे मे विस्तार से जाने :-

 योग के 8 अंगों में प्राणायाम का स्थान चौथे नंबर पर आता है। प्राणायाम को आयुर्वेद में मन, मस्तिष्क और शरीर की औषधि माना गया है। चरक ने वायु को मन का नियंता एवं प्रणेता माना है। आयुर्वेद अनुसार काया में उत्पन्न होने वाली वायु है उसके आयाम अर्थात निरोध करने को प्राणायाम कहते हैं। 


प्राणायाम का रहस्य

प्राणायाम का रहस्य
प्राणायाम क्रिया

कछुए की श्वास लेने और छोड़ने की गति इनसानों से कहीं अधिक दीर्घ है। व्हेल मछली की उम्र का राज भी यही है। बड़ और पीपल के वृक्ष की आयु का राज भी यही है। वायु को योग में प्राण कहते हैं।

प्राचीन ऋषि वायु के इस रहस्य को समझते थे तभी तो वे कुंभक लगाकर हिमालय की गुफा में वर्षों तक बैठे रहते थे। श्वास को लेने और छोड़ने के दरमियान घंटों का समय प्राणायाम के अभ्यास से ही संभव हो पाता है। यही प्राणायाम का रहस्य है

शरीर में दूषित वायु के होने की स्थिति में भी उम्र क्षीण होती है और रोगों की उत्पत्ति होती है। पेट में पड़ा भोजन दूषित हो जाता है, जल भी दूषित हो जाता है तो फिर वायु क्यों नहीं। यदि आप लगातार दूषित वायु ही ग्रहण कर रहे हैं तो समझो कि समय से पहले ही रोग और मौत के निकट जा रहे हैं।

बाल्यावस्था से ही व्यक्ति असावधानीपूर्ण और अराजक श्वास लेने और छोड़ने की आदत के कारण ही अनेक मनोभावों से ग्रसित हो जाता है। जब श्वास चंचल और अराजक होगी तो चित्त के भी अराजक होने से आयु का भी क्षय शीघ्रता से होता रहता है।

फिर व्यक्ति जैसे-जैसे बड़ा होता है काम, क्रोध, मद, लोभ, व्यसन, चिंता, व्यग्रता, नकारात्मता और भावुकता के रोग से ग्रस्त होता जाता है। उक्त रोग व्यक्ति की श्वास को पूरी तरह तोड़कर शरीर स्थित वायु को दूषित करते जाते हैं जिसके कारण शरीर का शीघ्रता से क्षय होने लगता है।

हठयोगियों ने विचार किया कि यदि सावधानी से धीरे-धीरे श्वास लेने व छोड़ने और बाद में रोकने का भी अभ्यास बनाया जाए तो परिणामस्वरूप चित्त में स्थिरता आएगी। श्वसन-क्रिया जितनी गहरी, लंबी, मंद और सूक्ष्म होगी उतना ही लंबा और मंद जीवन क्रिया के क्षय होने का क्रम होगा।

इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियां प्रमुख हैं। प्राणायम के लगातार अभ्यास से ये नाड़ियां ‍शुद्ध होकर जब सक्रिय होती हैं तो व्यक्ति के शरीर में किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता और आयु प्रबल हो जाती है। मन में किसी भी प्रकार की चंचलता नहीं रहने से स्थिर मन शक्तिशाली होकर धारणा सिद्ध हो जाती है अर्थात ऐसे व्यक्ति की सोच फलित हो जाती है। यदि लगातार इसका अभ्यास बढ़ता रहा तो व्यक्ति सिद्ध हो जाता है।

आओ जानते हैं कैसे करें प्राणायाम और कौन-सा रोग मिटेगा प्राणायाम से-

प्राणायाम के प्रकार:-

1.पूरक        2. कुम्भक        3.  रेचक।

(1)पूरक:-

अर्थात नियंत्रित गति से श्वास अंदर लेने की क्रिया को पूरक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब भीतर खिंचते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।

(2)कुम्भक:-

अंदर की हुई श्वास को क्षमतानुसार रोककर रखने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं। श्वास को अंदर रोकने की क्रिया को आंतरिक कुंभक और श्वास को बाहर छोड़कर पुन: नहीं लेकर कुछ देर रुकने की क्रिया को बाहरी कुंभक कहते हैं। इसमें भी लय और अनुपात का होना आवश्यक है।

(3)रेचक:-

अंदर ली हुई श्वास को नियंत्रित गति से छोड़ने की क्रिया को रेचक कहते हैं। श्वास धीरे-धीरे या तेजी से दोनों ही तरीके से जब छोड़ते हैं तो उसमें लय और अनुपात का होना आवश्यक है।

प्राणायाम के पंचक:-

1.व्यान,  2.समान,  3.अपान,. 4. उदान और  5.प्राण।

प्रमुख प्राणायाम:-


1.भस्त्रिका प्राणायाम


अन्य नाम

धौंकनी

विवरण

भस्त्रिका प्राणायाम में मुख्य रूप से गहरी सांस लेनी होती है। सांस पूरी अंदर लेनी है और बाहर छोड़नी है। बाहर छोड़ते वक्त जोरसे छोड़ें |

कैसे करें

एक आरामदायक आसन में सीधे बैठें।

दोनों नाक के माध्यम से गहरी श्वास लें और तेजी से साँस छोडें।

श्वास पेट के मध्य और निचले भागों के इस्तेमाल से नाक के माध्यम से साँस छोडें। इसे 5 से 10 बार कर सकते हैं |

लाभ

भस्त्रिका करने से फेफड़ों के लिए भरपूर मात्रा में ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है।

यह श्वसन प्रणाली के विकारों को हटा देती है | दक्षता में सुधार और चेतना की शुद्धता को बढ़ाती है | शरीर में गर्मी पैदा करता है और भूख बढ़ जाती है | बलगम नष्ट कर देता है।

भस्त्रिका पाचन तंत्र, मधुमेह, साइनस आदि के लिए उपयोगी है |

सावधानी

आप धौंकनी की अपनी प्रारंभिक प्रैक्टिस में श्वास बहुत दूर धकेलने के प्रलोभन से बचे |

इसे अधिक मात्रा में करने से चक्कर आना, उनींदापन जैसी चीजें हो सकती है।


2.भ्रामरी प्राणायाम 




अन्य नाम
नाक खर्राटे

विवरण

इस प्राणायाम का नाम भ्रामरी है क्योंकि इसमे भौंरे जैसा आवाज निकालते हैं |

कैसे करें

किसी भी आसान मुद्रा में बैठें |

अपनी उँगलियां आँखों पर रख कर आँखे बंद कर ले | आँखों पर दबाव न पड़े इसका ध्यान रखें | अंगूठे से कान बंद कर लें |

अब सांस अंदर लेकर एक मधुमक्खी की तरह गूंज करिए, जैसे उम्म्मम्म ध्वनि बनाते हुए नाक के माध्यम से साँस छोडिये। 5 से 10 राउंड करो।

लाभ

मूड फ्रेश होता है और ज्ञान में वृद्धि होती है।

इसे करने से यौगिक ध्यान में सफलता मिलती है।



3.कपालभाती 



अन्य नाम

कपाल उदय सांस, ललाट मस्तिष्क शोधन, कपालभाती, कपालभारती

विवरण

कपालभाती दो शब्दों से बना है - कपाल यानि मस्तिष्क/सिर और भाती यानि चमक। यह प्राणायाम मुख्य रूप से मस्तिष्क और मस्तिष्क के तहत अंगों को अच्छी तरह से प्रभावित करता है।

कैसे करें

पद्मासन में बैठे |

पेट के निचले हिस्से से हल्का झटका अंदर की ओर दें और सांस नाक से बाहर फेंके | फिर पेट ढीला छोड़ दें | फिर हल्के झटके से सांस बाहर फेंके |

इस तरह से लयबद्ध तरीके से करिये |

लाभ

यह आपको स्फूर्तिदायक बनाता है, शरीर में गर्मी पैदा करता है | बीमारी और एलर्जी से बचाता है।

सावधानी

आम व्यक्ति इसे 200 बार कर सकते हैं। इस संख्या में वृद्धि करना उचित नहीं है।

दिल और फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित मरीजों को विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही यह अभ्यास करना चाहिए।

रक्त परिसंचरण/ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों को बहुत सावधानी से प्रक्रिया को पूरा करना चाहिए। उन्हें भी विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही यह अभ्यास करना चाहिए।


4.केवली कुम्भक प्राणायाम


केवली कुम्भक प्राणायाम को साधना नहीं पड़ता, लेकिन साधना जरूरी भी है। तैराक लोग इसे अनंजाने में ही साध लेते हैं फिर भी वे इसे विधिवत करके साधें तो तैरने की गति और स्टेमिना और बढ़ सकता है। 

केवली प्राणायाम को कुम्भकों का राजा कहा जाता है। दूसरे सभी प्राणायामों का अभ्यास करते रहने से केवली प्राणायाम स्वत: ही घटित होने लगता है। लेकिन फिर भी साधक इसे साधना चाहे तो साध सकता है। इस केवली प्राणायाम को कुछ योगाचार्य प्लाविनी प्राणायाम भी कहते हैं। हालांकि प्लाविनी प्राणायाम करने का और भी तरीका है।

केवली की विधि

स्वच्छ तथा उपयुक्त वातावरण में सिद्धासन में बैठ जाएं। अब दोनों नाक के छिद्र से वायु को धीरे-धीरे अंदर खींचकर फेफड़े समेत पेट में पूर्ण रूप से भर लें। इसके बाद क्षमता अनुसार श्वास को रोककर रखें। फिर दोनों नासिका छिद्रों से धीरे-धीरे श्वास छोड़ें अर्थात वायु को बाहर निकालें। इस क्रिया को अपनी क्षमता अनुसार कितनी भी बार कर सकते हैं।

दूसरी विधि

रेचक और पुरक किए बिना ही सामान्य स्थिति में श्वास लेते हुए जिस अवस्था में हो, उसी अवस्था में श्वास को रोक दें। फिर चाहे श्वास अंदर जा रही हो या बाहर निकल रही हो। कुछ देर तक श्वासों को रोककर रखना ही केवली प्राणायाम है।

विशेषता

इस प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने के बाद फलरूप में जो प्राप्त होता है, वह है केवल कुम्भक। इस कुम्भक की विशेषता यह है कि यह कुम्भक अपने आप लग जाता है और काफी अधिक देर तक लगा रहता है। इसमें कब पूरक हुआ, कब रेचक हुआ, यह पता नहीं लगता। 

इसका अभ्यास करने से उसका श्वास-प्रश्वास इतना अधिक लंबा और मंद हो जाता है कि यह भी पता नहीं रहता कि व्यक्ति कब श्वास-प्रश्वास लेता-छोड़ता है। इसके सिद्ध होने से ही योगी घंटों समाधि में बैठें रहते हैं। यह भूख-प्यास को रोक देता है।

इसका लाभ

यह प्राणायाम कब्ज की शिकायत दूर कर पाचनशक्ति को बढ़ाता है। इससे प्राणशक्ति शुद्ध होकर आयु बढ़ती है। यह मन को स्थिर व शांत रखने में भी सक्षम है। 

इससे स्मरण शक्ति का विकास होता है। इससे व्यक्ति भूख को कंट्रोल कर सकता है और तैराक पानी में घंटों बिना हाथ-पैर हिलाएं रह सकता है। 

इस प्राणायाम के सिद्ध होने से व्यक्ति में संकल्प और संयम जागृत हो जाता है। वह सभी इंद्रियों में संयम रखने वाला बन जाता है।

 ऐसे व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति होने लगती हैं। इसके माध्यम से सिद्धियां भी प्राप्त की जा सकती है।

सावधानी

इसका अभ्यास किसी योग शिक्षक के सान्निध्‍य में ही करें।

5.कुम्भक प्राणायाम



 श्वास को अंदर रोकने की क्रिया को आंतरिक और बाहर रोकने की क्रिया को बाहरी कुम्भक कहते हैं। कुम्भक करते वक्त श्वास को अंदर खींचकर या बाहर छोड़कर रोककर रखा जाता है।

1.आंतरिक कुम्भक

इसके अंतर्गत नाक के छिद्रों से वायु को अंदर खींचकर जितनी देर तक श्वास को रोककर रखना संभव हो रखा जाता है और फिर धीरे-धीरे श्वास को बाहर छोड़ दिया जाता है।

2.बाहरी कुम्भक

इसके अंतर्गत वायु को बाहर छोड़कर जितनी देर तक श्वास को रोककर रखना संभव रोककर रखा जाता है और फिर धीरे-धीरे श्वास को अंदर खींचा लिया जाता है।

मात्रा या अवधि

कुम्भक क्रिया का अभ्यास सुबह, दोपहर, शाम और रात को कर सकते हैं। कुम्भक क्रिया का अभ्यास हर 3 घंटे के अंतर पर दिन में 8 बार किया जा सकता है।

ध्यान रहे कि कुम्भक की आवृत्तियां शुरुआत में 1-2-1 की होनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर यदि श्वास लेने में एक सैकंड लगा है, तो उसे दो सैकंड के लिए अंदर रोके और दो सैकंड में बाहर निकालें। फिर धीरे-धीरे 1-2-2, 1-3-2, 1-4-2 और फिर अभ्यास बढ़ने पर कुम्भक की अवधि और भी बढ़ाई जा सकती है। एक ओंकार उच्चारण में लगने वाले समय को एक मात्र माना जाता है। सामान्यतया एक सेकंड या पल को मात्रा कहा जाता है।

विशेषता

कुम्भक को अच्छे से रोके रखने के लिए जालंधर, उड्डियान और मूलबंध बंधों का प्रयोग भी किया जाता है। इससे कुम्भक का लाभ बढ़ जाता है। मूर्च्छा और केवली प्राणायाम को कुम्भक प्राणायाम में शामिल किया गया है।

लाभ

कुम्भक के अभ्यास से आयु की वृद्धि होती है। संकल्प और संयम का विकास होता है। भूख और प्यास कर कंट्रोल किया जा सकता है। इससे खून साफ होता है।

 फेफड़े शुद्ध-मजबूत होते हैं। शरीर कांतिमान बनता है। नेत्र ज्योति बढ़ती है। नकारात्मक चिंतन सकारात्मक बनता है तथा भय और चिंता दूर होते हैं।

सावधानी

दमा तथा उच्च-रक्तचाप के रोगी कुम्भक न लगाएँ। कुम्भक लगाने के पहले किसी योग विशेषज्ञ से सलाह ले लें।

6.दीर्घ प्राणायाम




दीर्घ का अर्थ होता है लंबा। यह प्राणायाम मनुष्य की आयु बढ़ाने वाला है अर्थात दीर्घायु करने वाला। इस प्राणायाम से छाती, फेफड़े और मांसपेशियां मजबूत तथा स्वस्थ होती है। शरीर तनाव मुक्त रहकर फुर्तीला बनता है।

तीन चरण में किए जाने वाले इस प्राणायाम को करने की चार स्टेप हैं-पहला सांस को नियंत्रित करना, दूसरा श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित कर दीर्घ करना, तीसरा आंतरिक और चौथा बाहरी कुंभक का अभ्यास करना।

इस दौरान पेट, छाती और मांसपेशियों पर ध्यान देना। यह उसी तरह है जबकी हम बहुत ही गहरी नींद में श्वास लेते हैं।

प्राणायाम विधि :

सर्व प्रथम आराम की मुद्रा में जमीन पर पीठ के बल लेट जाएं। फिर हथेलियों को पेट पर हल्के से रखें। दोनों हाथों की मध्यमा अंगुली नाभि पर एक दूसरे को स्पर्श करता रहे। फिर धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए पेट को भी ढीला छोड़ दें। अब श्वास खींचते हुए पेट को फुलाइए।

इस क्रिया को 5 मिनट तक बार-बार दोहराएं। क्रिया करते वक्त श्वास को पहले छाती में, फिर पसलियों में और फिर पेट में महसूस करना चाहिए। इस प्राणायाम क्रिया को बहुत ही आराम से करें।

इस प्राणायाम को करते समय पेट की गति अर्थात संकुचन, छाती और मांसपेशियों पर ध्यान रखना चाहिए। जब आप श्वास लेते हैं तो आपके दोनों कंघे ऊपर आते हैं और श्वास छोड़ते हुए नीचे की ओर जाते हैं तो कंधों में भी श्वसन की लय को महसूस करें।

सावधानी :

जिन लोगों को श्वसन संबंधी कोई रोग या परेशानी है अथवा फेफड़ों में कुछ शिकायत है उन्हें इस योग को करने से पहले चिकित्सक और योग शिक्षक से सलाह लेनी चाहिए।

प्राणायाम क्रिया के दौरान शरीर को सामान्य और सहज मुद्रा में रखे। श्वसन क्रिया में विशेष बल नहीं लगाना चाहिए और आराम से श्वास लंबी लेना और छोड़ना चाहिए। इस योग में पहले छाती फिर पसलियां इसके पश्चात पेट श्वसन क्रिया में भाग लेता है अत: इसे तीन चरण श्वसन भी कहा जाता है।

इसके लाभ :

यह योग मानसिक शांति एवं चेतना के लिए भी लाभप्रद होता है। यह शरीर में ऑक्सिजन के लेवल को बढ़ाता है तथा दूषित पथार्थ को बाहर निकालता है। 

यह प्राणायाम मनुष्य की आयु बढ़ाने वाला है अर्थात दीर्घायु करने वाला। इस प्राणायाम से छाती, फेफड़े और मांसपेशियां मजबूत तथा स्वस्थ होती है। शरीर तनाव मुक्त रहकर फुर्तीदायक बनता है।

7.सीत्कारी प्राणायाम 



सीत्कारी या सित्कार एक प्राणायाम का नाम है। इस प्राणायाम को करते समय 'सीत्‌ सीत्‌' की आवाज निकलती है, इसी कारण इसका नाम सीत्कारी कुम्भक या प्राणायाम पड़ा है।

कैसे करें

सिद्धासन में बैठकर दांत पर दांत बैठाकर (मुंह खुले हुए) उसके पीछे जीभ को लगाकर, धीरे-धीरे मुंह से श्वास को अंदर खिंचें। बाद में त्रिबन्धों के साथ कुम्भक करें। कुछ देर बाद श्वास को नाक से निकाल दें और पुन: श्वास को अंदर खिंचें। यह ‍प्रक्रिया 10 से 12 बार करें। इसके करने से मुंह के अंदर का भाग सूखने लगता है।

इसके लाभ

इस प्राणायाम के अभ्यास से शरीर में ऑक्सिजन की कम दूर होती है और शारीरिक तेज में वृद्धि होती है। मूलत: यह चेहरे की चमक बढ़ाकर सौंदर्य वृद्धि करता है। 

इसके अभ्यास से भूख-प्यास, नींद आदि नहीं सताते तथा शरीर सतत स्फूर्तिवान बना रहता है।

इससे शरीर में स्थित अतिरिक्त गर्मी समाप्त होती है जिससे पेट की गर्मी और जलन कम हो जाती है। इसके नियमित अभ्यास से ज्यादा पसीना आने की शीकायत दूर होती है।



8.मूर्छा कुम्भक प्राणायाम


मूर्छा का अर्थ होता है बेहोशी। इस कुम्भक के अभ्यास से वायु मूर्छित होती है, लेकिन व्यक्ति नहीं। परिणामतः मन भी मूर्छित होता है, इसी कारण इसे मूर्छा कुम्भक प्राणायाम (murcha pranayama) कहा जाता है। मूर्छा प्राणायाम का अभ्यास अधिक कठिन है।

विधि

सिद्धासन में बैठ जाएं और गहरी श्वास लें फिर श्वास को रोककर जालन्धर बंध लगाएं। फिर दोनों हाथों की तर्जनी और मध्यमा अंगुलियों से दोनों आंखों की पलकों को बंद कर दें। दोनों कनिष्का अंगुली से नीचे के होठ को ऊपर करके मुंह को बंद कर लें। इसके बाद इस स्थिति में तब तक रहें, जब तक श्वास अंदर रोकना सम्भव हों। फिर धीरे-धीरे जालधर बंध खोलते हुए अंगुलियों को हटाकर धीरे-धीरे श्वास बाहर छोड़ दें। इस क्रिया को 3 से 5 बार करें।

लाभ

इस क्रिया को करते वक्त पानी बरसने जैसी आवाज कंठ से उत्पन्न होती है, तथा वायु मूर्छित होती है, जिससे मन मूर्छित होकर अंततः शान्त हो जाता है। इस प्राणायाम के अभ्यास से तनाव, भय, चिंता आदि दूर होते हैं। 

यह धातु रोग, प्रमेह, नपुंसकता आदि रोगों को खत्म करता है। इस प्राणायाम से शारीरिक और मानसिक स्थिरता कायम होती है।

सावधानी

श्वास को रोककर रखते समय मन में किसी भी प्रकार के विचार न आने दें। यह क्रिया हाई ब्लडप्रेशर, चक्कर या मस्तिष्क से पीड़ित लोगों को नहीं करनी चाहिए। इस क्रिया से शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम होने से हृदय की गति कम हो जाता है, जिससे व्यक्ति बेहोशी की अवस्था में चला जाता है, लेकिन वह बेहोश नहीं होता है। इसीलिए इस क्रिया को योग शिक्षक की देख-रेख में ही करना चाहिए।-शतायु

9.सूर्य भेदन प्राणायाम



इसमें पूरक दायीं नासिका से करते हैं। दायीं नासिका सूर्य नाड़ी से जुड़ी मानी गई है। इसे ही सूर्य स्वर कहते हैं। इस कारण इसका नाम सूर्य भेदन प्राणायाम है।

इसकी विधि

किसी भी सुखासन में बैठकर मेरुदंड सीधा रखते हुए दाएं से प्रणव मुद्रा बनाते हैं और अंगुली को रखते हैं दायीं नासिका पर, फिर बायीं नासिका बंद कर दायीं नासिका से पेट और सीना फुलाते हुई पूरक क्रिया करते हैं। यथाशक्ति कुम्भक करने के बाद बंद हटाकर बायीं नासिका से रेचक करते हैं।

प्राणायाम का लाभ

सूर्यभेदन प्राणायाम के नियमित अभ्यास से शरीर के अंदर गर्मी उत्पन्न होती है। सर्दियों के दिनों में इस प्राणायाम का अभ्यास किया जाए जो कफ संबंधी रोगों में यह लाभदायक है।

 नजला, खांसी, दमा, साइनस, लंग्स, हृदय और पाइल्स के लिए भी यह प्राणायाम लाभदायक है।
इसके अभ्यास से मन शांत होता है तथा मस्तिष्क से तंद्रा दूर होती है। यह सकारात्मक विचारों का संचार करने में सहयोगी है। 

खासकर इससे सेक्स ऊर्जा को सही आयाम मिलता है।समें प्रारम्भ में पूरक, रेचक और कुम्भक एक, चार और दो रशों में करते हैं। बाद में धीरे-धीरे बढ़ाकर पूरक-15, कुम्भक-60 और रेचक-30 रशों में करें। रशों अर्थात जितनी भी देर भी आप पूरक करते हैं उससे दो रेचक और चार गुना कुम्भक करें। जैसे यदि आप 15 सेकंड पूरक करते हैं तो 60 सेकंड कुम्भक करें और फिर 30 सेकंड रेचकर करें।

सावधा‍नी

पूरक करते समय पेट और सीने को ज्यादा न फुलाएं। श्वास पर नियंत्रण रखकर ही पूरक क्रिया करें। पूरक-रेचक करते समय श्वास-प्रश्वास की आवाज नहीं आनी चाहिए। प्राणायाम बंद कमरे में न करें और न ही पंखे में। प्राणायाम के अभ्यास के लिए साफ-सुथरे वातावरण की जगह होना चाहिए।



10.प्रणव प्राणायाम



अन्य नाम

ओम का ध्यान

विवरण

सभी प्राणायाम करने के बाद अपना ध्यान साँस पर केंद्रित करें, और ॐ का स्मरण करें | शुरुआत में सांस का घर्षण नाक की नोक पर महसूस किया जाएगा।

एक दर्शक बन अपने आप को देखिये | गहरी सांस ले और सांस इतने धीरे लें की उसकी आवाज भी न हो | कोशिश करें की सांस इतनी धीरे लें की अगर नाक के सामने रुई का टुकड़ा भी रख दें तो वो भी न हिलें |

धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाने का प्रयास करें और एक मिनट में एक बार ही साँस लेने का प्रयास करें।

इस प्रकार सांस पर ध्यान देने की कोशिश करें।

कैसे करें

अपनी आँखें बंद करो और शांत मन से बैठ जाओ।

स्वाभाविक रूप से साँस लो।

सांसो पर ध्यान केंद्रित करिये और भगवान के बारे में सोचें।

भगवान ने ओम् आकार में हमारी भौहें, आंख, नाक, कान, होंठ, दिल आदि बनाए हैं।

हर कण में भगवान की उपस्थिति की कल्पना कीजिए और ध्यान कीजिए। अवधि: 2 से 3 मिनट या अधिक।

लाभ

गहरी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होगा।

प्राणायाम, शारीरिक विकारों पर काबू पा अच्छे स्वास्थ्य का वरदान देता है और भक्त आध्यात्मिकता की राह पर आगे बढ़ता है।


लंबे समय तक अभ्यास के माध्यम से एक योगी एक मिनट में एक सांस लेता है।

प्रणव प्राणायाम उपर दिए गए प्राणायाम करने के बाद किया जाता है जो विपस्यना या प्रेक्षा ध्यान का दूसरा रूप है।

यह पूरी तरह से ध्यान पर आधारित है। हर एक को प्राणायाम करना चाहिए।

योगी समय की उपलब्धता के अनुसार, घंटों तक प्रणव का ध्यान करते हैं।

इस प्रक्रिया में सांस लेने की कोई आवाज नहीं आती है, और इस शांतिपूर्ण ध्यान से साधक मन की गहराई में चला जाता है | जहां उसकी इन्द्रियां मन में समां जाती हैं, मन प्राण में और प्राण आत्मा मैं | और आत्मा से साधक परमात्मा का अनुभव करता है |

11.अग्निसार प्राणायाम


अग्निसार प्राणायाम क्रिया योग से शरीर के अंदर अग्नि उत्पन होने के कारण अंदर के रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। इस प्लाविनी क्रिया भी कहते हैं।

अग्निसार विधि

इस प्राणायाम का अभ्यास खड़े होकर, बैठकर या लेटकर तीनों तरह से किया जा सकता है। आप चाहे तो सिद्धासन में बैठकर दोनो हाथ को दोनों घुटनों पर रखें और शरीर को स्थिर करें। अब पेट और फेंफड़े की वायु को बाहर छोह़ते हुए उड्डीयान बंध लगाएँ अर्थात पेट को अंदर की ओर खींचे। 

सहजता से जितनी देर श्वास रोक सकें रोंके और पेट को नाभि पर से बार-बार झटके से अंदर खींचें और ढीला छोड़ें अर्थात श्वास को रोककर रखते हुए ही पेट को तेजी से 3 बार फुलाएँ और पिचकाएँ। ध्यान मणिपुर चक्र (नाभि के पीछे रीढ़ में) पर रहे। यथाशक्ति करने के बाद श्वास लेते हुए श्वास को सामान्य कर लें।

इसके लाभ

यह क्रिया हमारी पाचन ‍प्रक्रिया को गति‍शील कर उसे मजबूत बनाती है। 

शरीर के सभी तरह के रोगाणुओं को भस्म कर शरीर को स्वस्थ करती है।

 यह क्रिया पेट की चर्बी घटाकर मोटापे को दूर करती है ता यह कब्ज में भी लाभदाय है।

सावधानी

प्राणायाम का अभ्यास स्वच्छ व साफ वातावरण में दरी या चटाई बिछाकर करना चाहिए। यदि पेट संबंधि किसी भी प्रकार का कोई गंभीर रोग हो तो यह क्रिया नहीं करना चाहिए।

12.उद्गीत प्राणायाम



अन्य नाम
जाप सांस, ॐ उच्चारण

विवरण

भगवान ने इस शरीर और इस ब्रह्मांड को 'ओमकारा' के रूप में बनाया है। 'ओमकारा' एक विशेष व्यक्ति या कोई आंकड़ा नहीं है, बल्कि एक दिव्य शक्ति है जो पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है। ओम का जप करने से आप ब्रह्मांड से ऊर्जा प्राप्त कर सकते है।

कैसे करें

नाक से गहरी सांस लें। और धीरे धीरे साँस छोड़ते हुए ॐ का उच्चारण करें। एक सांस में एक ॐ का उच्चारण करें | शांति से और जितना लंबा हो सके ॐ का उच्चारण करें |

तीन बार दोहराएँ।

लाभ

ध्यान, मन की शान्ति और समृद्धि |


13.प्लाविनी प्राणायाम



हमारे पूरे शरीर को स्वस्थ बनाएं रखने के लिए पाचन तंत्र का स्वस्थ और मजबूत होना आवश्यक है। पाचन तंत्र सुदृड़ है तो रोगों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ेगी साथ ही आप अच्‍छा महसूस करेंगे।

पाचन तंत्र को शक्तिशाली बनाने के लिए यहां प्रस्तुत है प्लाविनी और अग्निसार प्राणायाम की सामान्य जानकारी। प्लाविनी और अग्निसार प्राणायाम भी है तथा योग क्रिया भी। इस प्राणायाम को मौसम और योग शिक्षक की सलाह अनुसार करते हैं तो निश्चित ही लाभ मिलेगा।

प्लाविनी प्राणायाम :

पेट को गुब्बारे की तरह फुलाकर श्वास भल लें। जालंधर बंध (कंठ को ठोड़ी सीने से लगाकर बंद करना) एवं मूलबंध लगाकर (गुदाद्वार को खींचकर यथाशक्ति रोकना) कुछ देर तक इसी स्थिति में रोककर रखना।

फिर क्षमता अनुसार रोकने के बाद धीरे से सिर सीधा करते हुए पहले बिना मूलबंध शिथिल करें जालंधर बंध खोल दें। फिर रेचन करते हुए, पेट को अंदर दबाते हुए उड्डीयान की स्थिति तक ले जाएं और फिर मूलबंध खोल दें।

इसका लाभ :

मुख्यत: बड़ी आंत व मलद्वार की क्रियाशीलता बढ़ाती है। 

अध्यात्म की दृष्टि से ये चारों क्रियाएं मणिपुर चक्र को प्रभावित करती है। तथा अन्नि तत्व पर नियंत्रण लाती है।


14.शीतली प्राणायाम


कुछ प्राणायाम ऐसे है जो सर्दी में गर्मी और गर्मी में ठंडक पहुँचाते हैं। शीतली प्राणायाम से गर्मी के मौसम से निजात पाई जा सकती है। इसके अलावा यह मन की शांति और शारीरिक शीतलता प्रदान करता है। शीतली प्रणायाम छायादार वृक्ष की तरह है जो भरपूर ऑक्सिजन का निर्माण करते हैं।

विधि

सर्व प्रथम रीढ़ को सीधा रखते हुए किसी भी सुखासन में बैठ जाएँ। फिर जीभ को बाहर निकालकर उसे इस प्रकार मोड़े ही वह एक ट्यूब या नली के आकार जैसी बन जाए। फिर इस नली के माध्यम से ही धीरे-धीरे मुँह से साँस लें। हवा नलीनुमा इस ट्यूब से गुजरकर मुँह, तालु और कंठ को ठंडक प्रदान करेगी।

इसके बाद जीभ अंदर करके साँस को धीरे-धीरे नाक के द्वारा बाहर निकालें। इस प्राणायाम का अभ्यास दस बार कर सकते हैं। प्राणायाम का अभ्यास होने के बाद गर्मी के मौसम में इसकी अवधि आवश्यकता अनुसार बढ़ा सकते हैं।

सावधानी

शीतली प्राणायाम के समय साँस लयबद्ध और गहरी होना चाहिए। प्राणायाम के अभ्यास के बाद शवासन में कुछ देर विश्राम करें। जहाँ तक संभव हो सूर्योदय या सूर्यास्त के समय ही यह प्रणायम करें। तेज धूप में यह प्रणायाम न करें। धूल भरे वातावरण में भी प्राणायाम नहीं करना चाहिए।

लाभ

यह धातु रोग, प्रमेह, नपुंसकता आदि रोगों को खत्म करता है। इस प्राणायाम से शारीरिक और मानसिक स्थिरता कायम होती है।



15.बाह्य प्राणायाम


विवरण

इस प्राणायाम को करते समय फेफड़ों से हवा पूरी तरह से बाहर होती है इसलिए इसका नाम बाह्य प्राणायाम है।

कैसे करें

अपनी नाक के माध्यम से गहरी सांस लें।

पूरी सांस बाहर छोड दें। अपने शरीर से हवा पुश करने के लिए अपने पेट और डायाफ्राम का प्रयोग करें। यह साँस छोड़ना किसी भी तरह से आप के लिए असहज नहीं होना चाहिए।

अपने सीने को अपनी ठोड़ी स्पर्श करें और पूरी तरह से अपने पेट को अंदर और थोडा ऊपर की ओर खींच लें।

इस स्थिति को लंबे समय के लिए आरामदायक तरीके से करने के लिए अपनी सांस पकडिये।

फिर अपनी ठोड़ी धीरे से ऊपर उठाएं और धीरे धीरे में सांस लें। आपके फेफड़ों को पूरी तरह से हवा से भरलें।

इसे 3 से 5 बार दोहराएँ।

लाभ

पेट, हर्निया, मूत्रालय, गर्भाशय, गुर्दे की समस्याओं, मूत्राशय समस्याओं और सेक्स से संबंधित समस्याओं में लाभ होता है।

सावधानी

आम व्यक्ति पहले दो मिनट के लिए करें | फिर ५ मिनट तक करना शुरू कर देना चाहिए।

दिल और फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित मरीजों को विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही यह अभ्यास करना चाहिए।

16.उज्जायी प्राणायाम



उज्जायी का परिचय : 'उज्जायी' शब्द का अर्थ होता है- विजयी या जीतने वाला। इस प्राणायाम के अभ्यास से वायु को जीता जाता है। योग में उज्जायी क्रिया और प्राणायाम के माध्यम से बहुत से गंभीर रोगों से बचा जा सकता है बशर्तें की उक्त प्राणायाम और क्रिया को किसी योग्य योग शिक्षक से सीखकर नियमित किया जाए। इसका अभ्यास तीन प्रकार से किया जा सकता है- खड़े होकर, लेटकर तथा बैठकर।

उज्जायी प्राणायाम की विधी :

पहली विधि

सुखासन में बैठ कर मुंह को बंद करके नाक के दोनों छिद्रों से वायु को तब तक अन्दर खींचें (पूरक करें) जब तक वायु फेफड़े में भर न जाए। फिर कुछ देर आंतरिक कुंभक (वायु को अंदर ही रोकना) करें। 

फिर नाक के दाएं छिद्र को बंद करके बाएं छिद्र से वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें (रेचन करें)। वायु को अंदर खींचते व बाहर छोड़ते समय गले से खर्राटें की आवाज निकलनी चाहिए। इस तरह इस क्रिया का पहले 5 बार अभ्यास करें और धीरे-धीरे अभ्यास की संख्या बढ़ाते हुए 20 बार तक ले जाएं।

दूसरी विधि

कंठ को सिकुड़ कर श्वास इस प्रकार लें व छोड़ें की श्वास नलिका से घर्षण करते हुए आए और जाए। इसको करने से उसी प्रकार की आवाज उत्पन्न होगी जैसे कबूतर गुटुर-गूं करते हैं। उस दौरान मूलबंध भी लगाएं। 

पांच से दस बार श्वास इसी प्रकार लें और छोड़ें। फिर इसी प्रकार से श्वास अंदर भरकर जालंधर बंध (कंठ का संकुचन) शिथिल करें और फिर धीरे-धीरे रेचन करें अर्थात श्वास छोड़ दें। अंत में मूलबंध शिथिल करें। ध्यान विशुद्धि चक्र (कंठ के पीछे रीढ़ में) पर रखें।

सावधानी

इस प्राणायाम को करते समय कंठ में अंदर खुजलाहट एवं खांसी हो सकती है, बलगम निकल सकता है, लेकिन यदि इससे अधिक कोई समस्या हो तो इस प्राणायाम को न करें।

इसके लाभ

श्वास नलिका, थॉयराइड, पेराथायराइड, स्वर तंत्र आदि को स्वस्थ व संतुलित करती है।


 कुंडलिनी का पंचम सोपान है। जल तत्व पर नियंत्रण लाती है।

उज्जायी क्रिया

यह क्रिया दो प्रकार से की जाती है (1)खड़े रहकर (2)लेटकर। यहां प्रस्तुत है लेटकर की जाने वाली क्रिया। पीठ के सहारे जमीन पर लेट जाएं शरीर सीधा रखें। हथेलियों को जमीन पर शरीर से सटाकर रखें। एड़ियों को सटा लें तथा पैरों को ढीला रखें। सीधा ऊपर देखें तथा स्वाभाविक श्वास लें। 

1.मुंह के द्वारा लगातार तेजी से शरीर की पूरी हवा निकाल दें। हवा निकालने की गति वैसी ही रहनी चाहिए जैसी सीटी बजाने के समय होती है। चेहरे पर से तनाव को हटाते हुए होठों के बीच से हवा निकाल दी जाती है। 

2.नाक के दोनों छीद्रों से धीरे-धीरे श्वास खींचना चाहिए। शरीर ढीला रखें, जितना सुखपूर्वक श्वास खींचकर भर सकें, उसे भर लें। 

3.तब हवा को भीतर ही रोके और दोनों पैरों के अंगूठे को सटाकर उन्हें आगे की ओर फैला लें, प्रथम सप्ताह केवल तीन चार सेंकड करें। इसे बढ़ाकर आठ सेकंड तक करें या जितनी देर हम आसानी से श्वास रोक सकें, रोकें। 

4.फिर मुंह से ठीक उसी प्रकार श्वास निकालें, जैसे प्रथम चरण में किया गया, जल्दबाजी न करें, श्वास छोड़ने के समय मांसपेशियों को ऊपर से नीचे तक ढीला करें अर्थात पहले सीने को तब पेट को जांघों, पैरों और हाथों को पूरी श्वास छोड़ने के बाद, पूरे शरीर को ढीला छोड़ दें। 5-10 सेकंड विश्राम करें।

सावधानी

प्रथम दिन 3 बार, द्वितीय दिन 4 बार, तृतीय दिन 5 बार इसे करें, इससे अधिक नहीं। इस प्राणायाम का अभ्यास साफ-स्वच्छ हवा बहाव वाले स्थान पर करें।

इसके लाभ

हृदय रोगी, उच्च-निम्न रक्तचाप वाले व्यक्तियों के लिए बहुत ही उपयुक्त। 


श्वास रोग और साइनस में लाभदायक। यह कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने में सहयोग करता है।

प्राणायाम के फायदे

योग के आठ अंगों में से चौथा अंग है प्राणायाम। प्राण+आयाम से प्राणायाम शब्द बनता है। प्राण का अर्थ जीवात्मा माना जाता है, लेकिन इसका संबंध शरीरांतर्गत वायु से है जिसका मुख्य स्थान हृदय में है। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब मरता है तो पूर्णत: श्वास छोड़ देता है। तब सिद्ध हुआ कि वायु ही प्राण है। आयाम के दो अर्थ है- प्रथम नियंत्रण या रोकना, द्वितीय विस्तार।

हम जब सांस लेते हैं तो भीतर जा रही हवा या वायु पांच भागों में विभक्त हो जाती है या कहें कि वह शरीर के भीतर पांच जगह स्थिर हो जाती है। पांच भागों में गई वायु पांच तरह से फायदा पहुंचाती है, लेकिन बहुत से लोग जो श्वास लेते हैं वह सभी अंगों को नहीं मिल पाने के कारण बीमार रहते हैं। प्राणायाम इसलिए किया जाता है ताकि सभी अंगों को भरपूर वायु मिल सके, जो कि बहुत जरूरी है।

(1) व्यान :

व्यान वह प्राणशक्ति है, जो समस्त शरीर में व्याप्त रहती है। इसे कदाचित् रक्त द्वारा शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचने वाले पोषक तत्वों के प्रवाह से जोड़ा जा सकता है। यह वायु समस्‍त शरीर में घूमती रहती है। इसी वायु के प्रभाव से रस, रक्‍त तथा अन्‍य जीवनोपयोगी तत्‍व सारे शरीर में बहते रहते हैं। शरीर के समस्‍त कार्यकलाप और कार्य करने की चेष्‍टाएं बिना व्‍यान वायु के संपन्‍न नहीं हो सकती हैं। जब यह कुपित होती है तो समस्‍त शरीर के रोग पैदा करती है।

व्यान वायु चरबी तथा मांस का कार्य भी करती है। यह वायु हमारी चरबी और मांस में पहुंचकर उसे सेहतमंद बनाए रखती है। यह शरीर से अतिरिक्त चर्बी को घटाती और चमड़ी को पुन: जवान बनाती है।

इस वायु के सही संचालन से हमारे शरीर का क्षरण रुक जाता है।

(2) समान :

नाभिक्षेत्र में स्थित पाचन क्रिया में सम्मिलित प्राणशक्ति को समान कहा जाता है। समान नामक संतुलन बनाए रखने वाली वायु का कार्य हड्डी में होता है। हड्डियों से ही संतुलन बनता भी है।

यह वायु हड्डियों के लिए लाभदायक है। हड्डियों तक इस वायु को पहुंचने में काफी मेहनत करना पड़ती है। यदि नहीं पहुंच पाती है तो हड्डियां कमजोर रहने लगती हैं।

आप भरपूर शुद्ध वायु का सेवन करें ता‍कि हड्डी तक यह वायु समान बनकर पहुंच सके। इस वायु से हड्डी सदा मजबूत और लचीली बनी रहती है। जोड़ों का दर्द नहीं होता और जोड़ों में पाया जाने वाला पदार्थ बना रहता है।

(3) अपान :

अपान का अर्थ नीचे जाने वाली वायु। यह शरीर के रस में होती है। रस अर्थात जल और अन्य तरल पदार्थ। यह वायु हमारी पाचनक्रिया के लिए जरूरी है।

यह वायु पक्‍वाशय में रहती है तथा इसका कार्य मल, मूत्र, शुक्र, गर्भ और आर्तव को बाहर निकालना है। जब यह कुपित होती है तब मूत्राशय और गुर्दे से संबंधित रोग होते हैं। अपान मलद्वार से निष्कासित होने वाली वायु है।

(4) उदान :

उदान का अर्थ ऊपर ले जाने वाली वायु। यह हमारे स्नायु तंत्र में होती है। यह स्नायु तंत्र को संचालित करती है। इसके खराब होने से स्नायु तंत्र भी खराब हो जाते हैं। उदान को मस्तिष्क की क्रियाओं को संचालित करने वाली प्राणशक्ति भी माना गया है।

सरल भाषा में कहें तो उदान वायु गले में रहती है। इसी वायु की शक्ति से मनुष्‍य स्‍वर निकालता है, बोलता है, गीत गाता है और निम्‍न, मध्‍यम और उच्‍च स्‍वर में बात करता है। विशुद्धि चक्र को जगाती है यही इसके फायदे हैं।

(5) प्राण :

यह वायु निरंतर मुख में रहती है और इस प्रकार यह प्राणों को धारण करती है, जीवन प्रदान करती है और जीव को जीवित रखती है। इसी वायु की सहायता से खाया-पिया अंदर जाता है। जब यह वायु कुपित होती है तो हिचकी, श्वास और इन अंगों से संबंधित विकार होते हैं। प्राणवायु हमारे शरीर का हालचाल बताती है।

इस वायु का दूसरा स्थान खून में और तीसरा स्थान फेफड़ों में होता। यह खून और फेफड़े की क्रियाओं को संचालित करती है। शरीर में प्राणवायु जीवन का आधार है। खून को खराब या शुद्ध करने में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहता है।



प्राणायाम से दूर होते हैं ये रोग

 प्राणायाम के नियमित अभ्यास से सभी तरह के रोगों से मुक्ति पाई जा सकती है।

योगकुडल्योपनिषद के अनुसार प्राणायाम से गुल्म, जलोदर, प्लीहा तथा पेट संबंध सभी रोग पूर्ण रूप से खत्म हो जाते हैं। प्राणायाम द्वारा 4 प्रकार के वात दोष और कृमि दोष को भी नष्ट किया जा सकता है। इससे मस्तिष्क की गर्मी, गले के कफ संबंधी रोग, पित्त-ज्वर, प्यास का अधिक लगना आदि रोग भी दूर होते हैं।

तो दोस्तों बताइये मेरे द्वारा प्रणायाम के बारे मे दी गयी जानकारी आपको कैसे लगी।अगर अछि लगी हो तो लाइक,शेयर ओर कमेंट जरूर करे।
धन्यवाद

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