योग मुद्राओं के बारे मे सही और स्पष्ट जानकारी.....

योग मुद्राओं के बारे मे सही और स्पष्ट जानकारी.....

दोस्तो मैं हु बजरंग आपका दोस्त जो आज योग मुद्राओं के बारे मे सही तरीका/ जानकारी बताऊंगा जिनको आप अपने जीवन में अपनाकर अपने शरीर को हमेशा के लिए रोग मुक्त कर सकोगे जिससे हमारे शरीर को बीमारी होने से बचा सकते ह और साथ ही हम हमारे शरीर को दवाइयों से मुक्त कर सकते ह ओर साथ ही लंबी आयु प्राप्त कर सकते हैं, जो मुख्य योग मुद्राये हैं उनके बारे मे विस्तार से जाने-

योग के अभ्यासकों में मुद्रा विज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कुछ योग विशेषज्ञ मुद्रा को 'हस्त योगा' भी कहते हैं। मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए विभिन्न योगासन और प्राणायाम के साथ इन मुद्राओं का अभ्यास करना भी जरूरी हैं। योग मुद्रा का अभ्यास करने से शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक लाभ होता हैं। 

योग में कई तरह की मुद्राओं का वर्णन किया है। आज हम यहाँ पर केवल साधारण मुद्रा की चर्चा करने जा रहे हैं। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पञ्च तत्वों से बना हुआ हैं। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए इन तत्वों को नियंत्रण में रखना जरुरी हैं। योग में मुद्रा विज्ञान द्वारा हम इन पंचतत्वों को नियंत्रण में रख सकते हैं। इन तत्वों को हाथ की उंगलियों व अंगूठे के द्वारा नियंत्रण में रखा जा सकता हैं।



योग सामान्य मुद्रा - विधि और लाभ



योगा न केवल वजन कम करने और खुद को फिट रखने वाला व्यायाम भर ही नहीं बल्‍कि यह एक प्राचीन कला भी है। यह आधुनिक विज्ञान के साथ संतों के ज्ञान को जोड़ती है और हमें स्‍वास्‍थ्‍य लाभ पहुंचाती है। योग में ना सिर्फ आसन ही शामिल है बल्‍कि मुद्राएं भी अपना अहम किरदार निभाती हैं। इन योग मुद्राओ से आप कई प्रकार के स्‍वास्‍थ्‍य लाभ उठा सकते हैं। हर योग मुद्रा विशिष्ट है जिनका रोज सही प्रकार से अभ्यास करना चाहिये। हर योग मुद्रा में एक गहरा रहस्‍य छुपा हुआ है। अगर आप इन मुद्राओं को नियमित रूप से करेगें तो, आपके शरीर में वायु बनने की बीमारी भी दूर हो जाएगी। 

इन योग मुद्राओं को अकेले शांति में बैठ कर करनी चाहिये। हर योग मुद्रा को करने का अपना अलग समय होता है। 

शरीर के मुलभुत पञ्च तत्व और हाथ का संबंध निचे दिया गया हैं : 

अंगूठा (Thumb) - अग्नि तत्व 
तर्जनी (Index finger) - वायु तत्व 
मध्यमा (Middle Finger) - आकाश तत्व 
अनामिका (Ring Finger) - पृथ्वी तत्व 
कनिष्का (Little Finger) - जल तत्व 


तो हम सबसे पहले पृथ्वी मुद्रा से शुरू करेंगे जो निम्न प्रकार है-             

पृथ्वी मुद्रा




विधि                                                                             

अनामिका उंगली को मोड़कर उसके अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग से गोलाकार बनाते हुए लगाने पर प्रथ्वी मुद्रा बनती हैं। इस मुद्रा से पृथ्वी तत्व मजबूत होता है और शारीरिक दुबलापन दूर होता हैं। अधिक लाभ लेने के लिए दोनों हाथों से पद्मासन या सुखासन में बैठकर करना चाहिए।

लाभ

सयंम और सहनशीलता को बढ़ती हैं। 

चेहरा तेजस्वी बनता है और त्वचा निखरती हैं। 

पृथ्वी मुद्रा से सभी तरह की कमजोरी दूर होती है। 

इससे वजन बढ़ता है। 

यह मुद्रा शरीर को स्वस्थ्‍य बनाए रखने में मदद करती है।



अग्नि / सूर्य मुद्रा

दोनो एक समान ही है।



विधि

सबसे पहले अनामिका उंगली को मोड़कर, अनामिका उंगली के अग्रभाग से अंगूठे के मूल प्रदेश को स्पर्श करना हैं। 

अब अंगूठे से अनामिका उंगली को हल्के से दबाना हैं। इस तरह अग्नि / सूर्य मुद्रा बनती हैं। 

इस मुद्रा का रोजाना 5 से लेकर 15 मिनिट तक अभ्यास करना चाहिए। 

लाभ

मोटापे से पीड़ित व्यक्तिओ के लिए वजन कम करने हेतु उपयोगी मुद्रा हैं। 

बढे हुए Cholesterol को कम कर नियंत्रित रखने के लिए उपयोगी मुद्रा हैं। 

इस मुद्रा से पाचन प्रणाली ठीक होती है। 

भय, शोक और तनाव दूर होते हैं। 

अगर आपको एसिडिटी / अम्लपित्त की तकलीफ है तो यह मुद्रा न करे।



जल मुद्रा



विधि

कनिष्का उंगली को मोड़कर, कनिष्का उंगली के अग्र भाग को अंगूठे के अग्र भाग से गोलाकार बनाते हुए लगाने पर जल मुद्रा बनती हैं। 

लाभ

इस मुद्रा से जल तत्व मजबूत बनता है और जल तत्व की कमी से होने वाले रोग दूर होते हैं। 


पेशाब संबंधी रोग में लाभ होता हैं। 

प्यास ठीक से लगती हैं। 

जिन लोगों की त्वचा शुष्क या रूखी / dry रहती है उनके लिए उपयोगी मुद्रा हैं।




वायु मुद्रा


विधि

सबसे पहले तर्जनी उंगली को मोड़कर अंगूठे के मूल (Base) प्रदेश पर लगाना हैं। 

इसके बाद मुड़ी हुई तर्जनी उंगली को अंगूठे से हलके से दबाकर रखना हैं। इस तरह से वायु मुद्रा बनती हैं। 

लाभ

वायु तत्व नियंत्रण में रहता हैं। 

वायु तत्व से होने वाले रोग जैसे की गठिया, गैस, डकार आना, हिचकी, उलटी, Paralysis, Spondylitis इत्यादि विकार में लाभ होता हैं।




प्राणवायु मुद्रा



विधि

अनामिका और मध्यमा को मोड़कर इन दोनों उंगलियों के अग्र भाग से अंगूठे के अग्रभाग को छूने से प्राणवायु मुद्रा बनती हैं। 

लाभ

इस मुद्रा से प्राणवायु नियंत्रण में रहता हैं। 

नेत्र दोष दूर होते हैं। 

शरीर की रोग प्रतिकार शक्ति / Immunity बढ़ती हैं।




अपान वायु मुद्रा



विधि

सबसे पहले तर्जनी उंगली को मोड़कर अंगूठे के मूल प्रदेश में लगाना हैं। 

इसके बाद अनामिका और मध्यमा इन दोनों उंगलियों को गोलाकार मोड़कर इनके अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग को छूना हैं। 

कनिष्का उंगली को सीधा रखना हैं। इस तरह अपान वायु मुद्रा बनती हैं। 

लाभ

इस मुद्रा से अपान वायु नियंत्रित रहती हैं। 

अपान वायु से होनेवाले रोग जैसे की ह्रदय रोग, बवासीर, कब्ज इत्यादि में उपयोगी मुद्रा हैं।




शुन्य मुद्रा



विधि

मध्यमा उंगली को मोड़कर उसके अग्रभाग से अंगूठे के मूल प्रदेश को स्पर्श करना हैं। 

इसके बाद अंगूठे से मध्यमा उंगली को हलके से दबाना हैं। 

अन्य उंगलियों को सीधा रखना हैं। 

इस तरह शुन्य मुद्रा बनती हैं। 

लाभ

इस मुद्रा से आकाश तत्व नियंत्रण में रहता हैं। 


ज्ञान मुद्रा


विधि

- पहले एक स्वच्छ और समतल जगह पर एक चटाई या योगा मैट बिछा दे। 

- अब पद्मासन या वज्रासन में बैठ जाये। 

- अपने हाथों को घुटनों पर रखे और हाथों की हथेली ऊपर की ओर आकाश की तरफ होनी चाहिए। 

- अब तर्जनी उंगली (अंगूठे के साथ वाली) को गोलाकार मोडकर अंगूठे के अग्रभाग (सिरे) को स्पर्श करना हैं। 

- अन्य तीनों उंगलियों को सीधा रखना हैं। 

- यह ज्ञान मुद्रा दोनों हाथो से कर सकते हैं। 

- आँखे बंद कर नियमित श्वसन करना हैं। 

- साथ में ॐ का उच्चारण भी कर सकते हैं। मन से सारे विचार निकालकर मन को केवल ॐ पर केन्द्रित करना हैं। 

- दिनभर में कम से कम 30 मिनिट से 45 मिनिट करने पर लाभ मिलता हैं। 

- ऐसे तो इस मुद्रा का अभ्यास हम किसी भी समय कर सकते हैं पर सुबह के समय और शाम के समय यह मुद्रा का अभ्यास करना अधिक फलदायी होता हैं।

लाभ

- ज्ञान मुद्रा का नियमित अभ्यास करने से सारे मानसिक विकार जैसे क्रोध, भय, शोक, ईर्ष्या इत्यादि से छुटकारा मिलता हैं। 

- बुद्धिमत्ता और स्मरणशक्ति में वृद्धि होती हैं। 

- एकाग्रता बढती हैं। 

- शरीर की रोग प्रतिकार शक्ति बढती हैं। 

- आत्मज्ञान की प्राप्ति होती हैं। 

- मन को शांति प्राप्त होती हैं। 

- अनिद्रा, सिरदर्द और माइग्रेन से पीड़ित लोगो के लिए उपयोगी मुद्रा हैं।"

यह मुद्रा कान में दर्द और बहरेपन में उपयोगी हैं।




आकाश मुद्रा


विधि

- पद्मासन या सुखासन मैं बैठे। 

- श्वासों की गति को सामान्य होने दे। 

- अपनी मध्यमा उंगली के सिरे को, अँगूठे के सिरे से स्पर्श करे और हल्का सा दबाये। 

- बाकी, तीन उंगलियों को सीधा रखे। 

- आँख बंद कर के अपनी श्वासों पर ध्यान केन्द्रित करे।

लाभ

- आकाश मुद्रा से हृदय के रोग दूर होते हैँ। 

- ह्रदय का विकास होता है। 

- हड्डियों की कमजोरी दूर होती हैं। 

- जोड़ों के रोग में लाभदायक है। 
- घुटने की दर्द, सूजन इत्यादि दूर होती है





वरुण मुद्रा


विधि

- पदमासन या सुखासन में बैठ जाएँ। 

- रीढ़ की हड्डी सीधी रहे एवं दोनों हाथ घुटनों पर रखें। 

- हाथ की सबसे छोटी उंगली (कनिष्का) को जल तत्व का प्रतीक माना जाता है। 

- जल तत्व और अग्नि तत्व (अंगूठें) को एकसाथ मिलाने से बदलाव होता है। 

- छोटी उंगली के आगे के भाग और अंगूठें के आगे के भाग को मिलाने से 'वरुण मुद्रा' बनती है। 

- बाकी की तीनों अँगुलियों को सीधा करके रखें।

लाभ

- वरुण मुद्रा शरीर के जल तत्व सन्तुलित कर जल की कमी से होने वाले समस्त रोगों को नष्ट करती है। 

- वरुण मुद्रा स्नायुओं के दर्द, आंतों की सूजन में लाभकारी है। 

- इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर से अत्यधिक पसीना आना समाप्त हो जाता है। 

- वरुण मुद्रा के नियमित अभ्यास से रक्त शुद्ध होता है एवं त्वचा रोग व शरीर का रूखापन नष्ट होता है। 

- यह मुद्रा शरीर के यौवन को बनाये रखती है। शरीर को लचीला बनाने में भी यह लाभप्रद है। 

- वरुण मुद्रा करने से अत्यधिक प्यास शांत होती है।





जलोदरनाशक मुद्रा


विधि

- कनिष्ठा को अँगूठे के जड़ में लगाए। 

- अब कनिष्ठा को उपर अंगूठे से हल्का सा दबाये। 

- बाकी बची हुई तीनों उंगलियों को सीधा रखने का प्रयास करे। 

- ज्यादा जोर दे कर सीधा न करे, धीरे धीरे प्रयास से यह संभव हैं।

लाभ

- जल तत्त्व की अधिकता से होने वाले सभी रोग, सूजन, जलोदर आदि में विशेष लाभ होता है। 

- यह मुद्रा रोग शान्त होने तक ही करें।




शंख मुद्रा


विधि

- बायें हाथ का अँगूठा दायें हाथ की मुट्ठी में पकडें। 

- अब बायें हाथ की तर्जनी दायें हाथ के अँगूठे के अग्रभाग को लगायें। 

- बायें हाथ की अन्य उँगलियाँ दायें हाथ की उँगलियों पर हल्का सी दबाये। 

- थोडी देर बाद हाथों को अदल-बदलकर पुनः यही मुद्रा करें। 

- इस मुद्रा में अंगूठे का दबाव हथेली के बीच के भाग पर और मुट्ठी की तीन उंगलियों का दबाव शुक्र पर्वत पर पड़ता है जिससे हथेली में स्थित नाभि और थाइरॉइड (पूल्लिका) ग्रंथि के केंद्र दबते हैं|

लाभ

- नाभि व कंठस्थ ग्रंथियों के विकार ठीक होते हैं। 

- इस मुद्रा का दीर्घ काल तक अभ्यास करने से वाणी के दोष निवृत्त होते हैं। 

- आवाज की मधुरता और गुणवत्ता बढती है। 

- गला बैठ जाने की तकलीफ में राहत मिलती है। 

- स्नायुओं और पाचन संस्थान का कार्य सुचारु रूप से होने लगता है। 

- आँतों एवं पेडू के रोग ठीक होते हैं।




सहज शंख मुद्रा


विधि

- सुखासन या वज्रासन में बैठ जाएँ। 

- यह एक दूसरे प्रकार की शंख है। 

- दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फंसाले। 

- अब हथेलियां दबाकर रखे। 

- और दोनों अंगूठों को बराबर में सटाकर रखे। 

- तयार मुद्रा को सीने के पास पकडे या वज्रासन में बैठाने के बाद घुटनो पर रखे।

लाभ

- इस मुद्रा को रोजाना करने से गुदा रोग जैसे बवासीर, भगंदर आदि पूरी तरह से समाप्त हो जाते हैं। 

- इससे हकलाना, तुतलाना और गले के सारे रोग समाप्त हो जाते हैं। 

- इस मुद्रा को करने से गैस दूर होती है और पाचनशक्ति में वृद्धि होकर भूख तेज हो जाती है।





लिंग मुद्रा


विधि

- दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फँसा कर बायें हाथ का अंगूठा खड़ा रखें। 

- दाहिने हाथ के अँगूठे से बायें हाथ के अँगूठे को लपेट लें।

लाभ

- इस मुद्रा से शरीर में गर्मी की वृद्धि होती है, अतः इसे सर्दी में करना विशेष उपयोगी है| 

- सर्दी, जुकाम, दमा, खाँसी, साइनस, लकवा, निम्र रक्तचाप में लाभ। 

- नाक बहना बन्द होता हैं एवं बन्द नाक खुल जाती है। 

- इस मुद्रा को करने के दौरान कुछ अधिक मात्रा में पानी पीना अथवा फलों के रस, दूध-घी का सेवन करना अच्छा रहता है|


दोस्तो बताइये मेरे द्वारा दी गयी योग मुद्राओं के बारे मे जानकारी कैसे लगी अगर अछि लगी हो तो लाइक,शेयर ओर कमेंट जरूर करे।
धन्यवाद।



Post a Comment

Previous Post Next Post